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महामहोपाध्याय रायबहादुर डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा (1863–1947 ई.) भारत के मूर्धन्य इतिहासकार, पुरालेखवेत्ता (Epigraphist) और प्राचीन लिपि विशेषज्ञ (Palaeographer) थे। उन्हें वैज्ञानिक और पुरातात्विक आधार पर राजस्थान का प्रामाणिक इतिहास लिखने वाले ‘मार्गशोधक इतिहासकार’ का दर्जा प्राप्त है।
1. जन्म एवं प्रारंभिक जीवन
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जन्म: 15 सितम्बर, 1863 को सिरोही रियासत (राजस्थान) के रोहिड़ा नामक गाँव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ।
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शिक्षा: प्रारंभिक शिक्षा और संस्कृत का ज्ञान पिता हीराचंद ओझा से प्राप्त किया। इसके बाद 1877 में उच्च शिक्षा के लिए मुंबई गए और 1885 में ‘एलफिंस्टन कॉलेज/हाईस्कूल’ से मैट्रिक पास की।
2. इतिहास और पुरातत्व में प्रवेश
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रोहिड़ा लौटने के बाद उन्होंने कर्नल जेम्स टॉड की ‘Annals and Antiquities of Rajasthan’ पढ़ी और राजस्थान के इतिहास की कमियों व त्रुटियों को दूर करने का संकल्प लिया।
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वे उदयपुर पहुँचे जहाँ मेवाड़ के प्रसिद्ध इतिहासकार कविराज श्यामलदास (ग्रंथ वीर विनोद के रचयिता) ने उनकी प्रतिभा को पहचानकर उन्हें उदयपुर के इतिहास विभाग और पुस्तकालय में नियुक्त किया। ओझा जी श्यामलदास को अपना गुरु मानते थे।
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1908 ई. में लॉर्ड कर्जन/मिंटो की योजना के अंतर्गत उन्हें अजमेर में स्थापित ‘राजपूताना म्यूजियम’ (राजपूताना संग्रहालय) का प्रथम अध्यक्ष (क्यूरेटर) नियुक्त किया गया, जहाँ वे 1938 तक सेवारत रहे।
3. प्रमुख रचनाएँ एवं ऐतिहासिक योगदान
(क) ‘भारतीय प्राचीन लिपिमाला’ (1894 ई.)
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यह भारतीय पुरालेख शास्त्र (Palaeography) पर किसी भारतीय द्वारा लिखी गई सर्वप्रथम प्रामाणिक पुस्तक है।
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इसमें ब्राह्मी लिपि से देवनागरी और अन्य भारतीय लिपियों के क्रमिक विकास को वैज्ञानिक रूप से रेखांकित किया गया।
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प्रसिद्ध जर्मन प्राच्यविद् डॉ. जॉर्ज बुहलर (Georg Bühler) के कई तर्कों को ओझा जी ने ठोस प्रमाणों से संशोधित किया, जिसके बाद अंतरराष्ट्रीय पुरातात्विक जगत में उनकी विशिष्ट पहचान बनी।
(ख) राजपूताने का इतिहास (The History of Rajputana Series)
कर्नल टॉड के विवरण भाट-चारण कथाओं पर अधिक निर्भर थे। ओझा जी ने शिलालेखों, ताम्रपत्रों और सिक्कों की मदद से प्रत्येक रियासत का वैज्ञानिक इतिहास लिखा:
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उदयपुर (मेवाड़) राज्य का इतिहास (2 भाग – 1928, 1932)
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जोधपुर राज्य का इतिहास (2 भाग – 1938, 1941)
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बीकानेर राज्य का इतिहास (2 भाग – 1937, 1940)
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डूंगरपुर राज्य का इतिहास (1936)
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बांसवाड़ा राज्य का इतिहास (1936)
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प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास (1940)
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सिरोही राज्य का इतिहास (1911)
(ग) अन्य प्रमुख ग्रंथ
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मध्यकालीन भारतीय संस्कृति (1945)
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सोलंकियों का इतिहास (1907)
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सुप्रसिद्ध इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड का जीवनचरित
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पृथ्वीराज विजय महाकाव्यम् (संपादन, चंद्रधर शर्मा गुलेरी के साथ)
4. कार्यपद्धति की विशिष्टता (Research Methodology)
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पाद-टिप्पणी (Footnotes/Citations) की परंपरा: हिंदी इतिहास-लेखन में प्रत्येक घटना का स्रोत (शिलालेख का श्लोक, संवत या पृष्ठ संख्या) फुटनोट में दर्ज करने की वैज्ञानिक परंपरा ओझा जी ने ही दृढ़ता से स्थापित की।
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शिलालेख आधारित साक्ष्य: उन्होंने कभी सुनी-सुनाई कहानियों को इतिहास नहीं माना; हर दावे की पुष्टि समकालीन अभिलेखों से की।
5. प्रमुख उपाधियाँ एवं सम्मान
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रायबहादुर (1914): ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रदत्त।
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महामहोपाध्याय (1927): अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा सम्मानित।
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डी. लिट (D.Litt. – 1935/1937): काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) द्वारा मानद उपाधि।
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साहित्य वाचस्पति (1935): हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग द्वारा।
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उनके 70वें जन्मदिवस पर उनके सम्मान में ‘भारतीय अनुशीलन ग्रंथ’ (अभिनंदन ग्रंथ) प्रकाशित किया गया था।
17 अप्रैल 1947 को अपनी जन्मभूमि रोहिड़ा में ही इस महान इतिहासकार का देहावसान हुआ।