कर्नल जेम्स टॉड (Colonel James Tod) राजस्थान के इतिहास और प्रतियोगी परीक्षाओं (RPSC, RSMSSB आदि) की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण व्यक्तित्व हैं। प्रामाणिक ऐतिहासिक स्रोतों के आधार पर उनसे जुड़े प्रमुख तथ्य निम्नलिखित हैं:
सामान्य परिचय व उपाधियां
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जन्म: 20 मार्च 1782 (इस्लिंगटन, लंदन)।
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उपनाम:
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“राजस्थान के इतिहास के जनक/पितामह” (Father of Modern Rajasthani History)
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“घोड़े वाले बाबा” (गांव-गांव घूमकर घोड़े पर सवार होकर इतिहास संकलित करने के कारण)।
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भारत आगमन: 1798-1799 में ईस्ट इंडिया कंपनी के सैन्य अधिकारी के रूप में बंगाल आए।
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राजस्थान में नियुक्ति: 1818 से 1822 के दौरान वे पश्चिमी राजपूत राज्यों (मेवाड़, मारवाड़, हाड़ौती आदि) के पॉलिटिकल एजेंट (P.A.) रहे।
गुरु एवं ऐतिहासिक स्रोत संकलन
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ऐतिहासिक गुरु: जैन मुनि यति ज्ञानचंद्र (मांडलगढ़, भीलवाड़ा)। टॉड ने अपनी प्रमुख पुस्तक इन्हीं को समर्पित की थी।
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अभिलेख व साक्ष्य: 1822 में इंग्लैंड लौटते समय भारी होने के कारण टॉड ने ‘मानमोरी का शिलालेख’ (चित्तौड़गढ़) समुद्र में फेंक दिया था।
प्रमुख ग्रंथ एवं रचनाएं
1. Annals and Antiquties of Rajasthan (1829 & 1832)
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अन्य नाम: The Central and Western Rajput States of India।
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प्रकाशन: लंदन से दो भागों में प्रकाशित (प्रथम भाग 1829 में, दूसरा भाग 1832 में)।
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मुख्य सामग्री: इसमें राजस्थान की विभिन्न रियासतों का इतिहास, भौगोलिक स्थिति, वंशावलियां तथा राजपूतों की सामंतवादी व्यवस्था (Feudal System) का विस्तृत विवरण है।
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नामकरण: इस पुस्तक में टॉड ने इस भू-भाग के लिए सर्वप्रथम “राजस्थान”, “रायथान” और “रजवाड़ा” शब्दों का प्रयोग किया।
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हिंदी अनुवाद: इस ग्रंथ का सर्वप्रथम प्रामाणिक हिंदी अनुवाद पंडित गौरीशंकर हीराचंद ओझा (G.H. Ojha) द्वारा किया गया।
2. Travels in Western India (1839)
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प्रकाशन: टॉड की मृत्यु (1835) के बाद 1839 में उनकी पत्नी जूलिया क्लटरबक द्वारा प्रकाशित करवाई गई।
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सामग्री: इसमें पश्चिमी भारत (विशेष रूप से गुजरात व राजस्थान के आबू, सिरोही क्षेत्र) की यात्रा, सामाजिक प्रथाओं एवं मंदिरों का वर्णन है।
टॉड द्वारा दिए गए प्रमुख भौगोलिक व ऐतिहासिक कथन (Quotes)
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माउंट आबू (गुरुशिखर): गुरुशिखर चोटी को टॉड ने “संतों का शिखर” (Peak of the Saints) कहा।
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माउंट आबू के मंदिर: दिलवाड़ा के जैन मंदिरों के शिल्प सौंदर्य की प्रशंसा करते हुए लिखा कि “ताजमहल के बाद यदि भारत में कोई सुंदर इमारत है, तो वह दिलवाड़ा के मंदिर हैं।”
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हल्दीघाटी का युद्ध (1576): इसे “राजस्थान की थर्मोपल्ली” (Thermopylae of Rajasthan) की संज्ञा दी।
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दिवेर का युद्ध (1582): इसे “राजस्थान का मैराथन” (Marathon of Mewar) कहा।
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भैंसरोड़गढ़ दुर्ग: इसके बारे में कहा कि “यदि मुझे राजस्थान में कोई एक जागीर या संपत्ति की पेशकश की जाए, तो मैं भैंसरोड़गढ़ दुर्ग को चुनूंगा।”
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राजपूतों की उत्पत्ति का मत: टॉड ने राजपूतों को विदेशी जाति (शक, सीथियन आदि) की संतान बताया, जिसका बाद में जी.एच. ओझा और सी.वी. वैद्य जैसे इतिहासकारों ने खंडन किया।