Study Notes

रावत कृष्णदास चूंडावत (सलूंबर)

Subject: प्रमुख व्यक्तित्व, राजस्थान का इतिहास एवं संस्कृति, राजस्थान का मध्यकालीन इतिहास एवं राजवंश | Target Exams: RAS, SI, 1st Grade, 2nd Grade, CET, Patwari
Log in to Suggest Correction
Last Verified:

रावत कृष्णदास चूंडावत (सलूंबर)

मुख्य परिचय / पृष्ठभूमि

रावत कृष्णदास चूंडावत मेवाड़ के प्रथम श्रेणी ठिकाने सलूंबर के जागीरदार तथा महाराणा लाखा के ज्येष्ठ पुत्र ‘राव चूंडा’ (मेवाड़ के भीष्म पितामह) के वंशज थे। वे महाराणा प्रताप के समकालीन परम निष्ठावान सामंत, ‘राज्याभिषेक क्रांति (1572 ई.)’ के मुख्य सूत्रधार तथा हल्दीघाटी युद्ध (1576 ई.) में मेवाड़ की सेना के प्रमुख हरावल सेनानी थे।

महत्वपूर्ण तथ्य एवं डेटा

  • पद / उपाधि: रावत (सलूंबर ठिकाने के प्रमुख सामंत)।
  • राजवंश / शाखा: सिसोदिया राजवंश की ‘चूंडावत’ शाखा (राव चूंडा के वंशज)।
  • जागीर / ठिकाना: सलूंबर (मेवाड़ का 16 प्रथम श्रेणी ठिकानों में सर्वोच्च और प्रथम ठिकाना)।
  • समकालीन शासक: महाराणा उदयसिंह द्वितीय एवं प्रातःस्मरणीय महाराणा प्रताप
  • प्रमुख ऐतिहासिक घटनाएँ:
    • 28 फरवरी 1572 ई. — गोगुंदा में जगमाल को हटाकर महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक संपन्न कराना।
    • 18 जून 1576 ई. — हल्दीघाटी के युद्ध में हरावल (अग्रिम दस्ते) का नेतृत्व एवं वीरता।
  • वंशानुगत विशेषाधिकार: मेवाड़ के महाराणा का राजतिलक करना, कमर में तलवार बांधना, महाराणा की अनुपस्थिति में राजधानी का संचालन करना तथा सभी राज्य-आज्ञाओं (सनदों) पर महाराणा के साथ भाला (सनद पर हस्ताक्षर स्वरूप) अंकित करना।

मुख्य विवरण

1. सलूंबर के चूंडावतों की पृष्ठभूमि एवं विशेषाधिकार

मेवाड़ के इतिहास में महाराणा लाखा के ज्येष्ठ पुत्र राव चूंडा ने अपने पिता के हंसाबाई से विवाह हेतु राज्य का त्याग किया था। उनके इस महान त्याग के बदले मेवाड़ राजदरबार में चूंडावतों (विशेषकर सलूंबर के रावत) को सर्वोच्च विशेषाधिकार दिए गए। रावत कृष्णदास चूंडावत को भी वही वंशानुगत अधिकार प्राप्त थे:
  • मेवाड़ सेना के हरावल (अग्रिम पंक्ति) में रहकर सबसे आगे युद्ध लड़ने का अधिकार केवल चूंडावत सरदारों के पास था।
  • नए महाराणा के राज्यारोहण के समय कमर में तलवार बांधने तथा राजतिलक करने का अधिकार।
  • राज्य के समस्त ताम्रपत्रों, पट्टों एवं सनदों पर महाराणा के हस्ताक्षर से पहले चूंडावतों का भाले का चिह्न अंकित होता था।

2. राज्याभिषेक क्रांति (1572 ई.) में निर्णायक भूमिका

28 फरवरी 1572 ई. (होली के दिन) को गोगुंदा में महाराणा उदयसिंह की मृत्यु के बाद जब धीरबाई (भटियाणी रानी) के प्रभाववश जगमाल को गद्दी पर बैठाने का प्रयास हुआ, तो रावत कृष्णदास चूंडावत ने दृढ़ता से इसका विरोध किया:
  • उन्होंने ग्वालियर के रामशाह तंवर, पाली के अखैराज सोनगरा और अन्य सरदारों को एकजुट कर निर्णय लिया कि संकटकाल में अयोग्य जगमाल के स्थान पर योग्य व ज्येष्ठ महाराणा प्रताप का राज्यारोहण होना चाहिए।
  • कृष्णदास चूंडावत ने स्वयं राजमहलों में जाकर जगमाल को गद्दी से उठाया और कहा—“आप मेवाड़ के महाराणा नहीं हो सकते, आपके बड़े भाई प्रताप ही मेवाड़ के सच्चे स्वामी हैं।”
  • इसके पश्चात उन्होंने श्मशान से लौटकर गोगुंदा की बावड़ी के निकट महाराणा प्रताप की कमर में राज्य की तलवार बांधकर उनका औपचारिक राज्याभिषेक संपन्न कराया।

3. हल्दीघाटी युद्ध (1576 ई.) में हरावल नेतृत्व

18 जून 1576 को हुए ऐतिहासिक हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप ने अपनी सेना का गठन परंपरागत व्यूहरचना के अनुसार किया:
सैन्य दस्ता मुख्य नेतृत्वकर्ता सहयोगी प्रमुख योद्धा
हरावल (अग्रिम दस्ता) हकीम खां सूर एवं रावत कृष्णदास चूंडावत रामशाह तंवर (ग्वालियर), सांगा चूंडावत (देवगढ़), भीमसिंह डोडिया
चंद्रावल (पिछला दस्ता) राणा पूंजा (पूंजा भील) चारण जैसा, पुरोहित गोपीनाथ, भील तीरंदाज
मध्य भाग (केन्द्र) महाराणा प्रताप भामाशाह, ताराचंद, चक्रपाणि मिश्र
हल्दीघाटी युद्ध के प्रथम भीषण प्रहार में कृष्णदास चूंडावत के नेतृत्व में हरावल दस्ते ने मुग़ल सेनापति कुंवर मानसिंह और आसफ खां के अग्रिम मोर्चे को छिन्न-भिन्न कर दिया, जिससे मुग़ल सेना में भगदड़ मच गई थी।

परीक्षा उपयोगी विशेष बिंदु (High-Yield Facts)

  • सलूंबर का दर्जा: मेवाड़ के 16 प्रथम श्रेणी ठिकानों (बत्तीसा व सोलह सामंतों) में सलूंबर के रावत का पद सर्वोच्च था और वे ‘महारावल’ के समान सम्मान प्राप्त करते थे।
  • ‘तलवार बांधने की रस्म’: 1572 ई. में गोगुंदा में महाराणा प्रताप को विधिवत तलवार रावत कृष्णदास चूंडावत ने ही बांधी थी।
  • हरावल का एकाधिकार: हल्दीघाटी युद्ध में मुगलों के विरुद्ध एकमात्र मुस्लिम सेनापति हकीम खां सूर के साथ हरावल मोर्चे पर मुख्य सामंत रावत कृष्णदास चूंडावत डटे हुए थे।
  • चूंडावत शौर्य परंपरा: राव चूंडा से लेकर रावत कृष्णदास और आगे चलकर ‘हाड़ी रानी (सहसकंवर)’ के पति रावत रतनसिंह चूंडावत (1679 ई.) तक, सलूंबर का इतिहास मेवाड़ की स्वतंत्रता के लिए सर्वोच्च बलिदान का पर्याय रहा है।

प्रामाणिक संदर्भ स्रोत

  1. RBSE कक्षा 10: राजस्थान का इतिहास एवं संस्कृति — अध्याय 1 (राजस्थान का इतिहास: मेवाड़ के प्रमुख सामंत व राज्याभिषेक क्रांति)।
  2. RBSE कक्षा 9: राजस्थान का स्वतंत्रता आंदोलन एवं शौर्य परंपरा — (मेवाड़ की शौर्य परंपरा एवं सामंत वर्ग)।
  3. राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी: राजस्थान का इतिहास — प्रो. गोपीनाथ शर्मा (अध्याय: महाराणा प्रताप कालीन सामंत व्यवस्था एवं हल्दीघाटी)।
  4. राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी: राजस्थान का स्वाधीनता संग्राम — डॉ. हुकुमचंद जैन व डॉ. नारायण लाल गुप्ता।

Verified Sources & Citations (प्रमाणित संदर्भ एवं स्रोत)

0 Verified
इस लेख पर अभी कोई बाहरी संदर्भ दर्ज नहीं है। यदि आपके पास प्रामाणिक संदर्भ पुस्तक (RBSE / हिंदी ग्रंथ अकादमी / राजस्थान सुजस) है, तो ऊपर दिए गए "Suggest Correction" बटन से सुधार दर्ज करें।