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महाराणा उदयसिंह द्वितीय (1537–1572 ई.)

Subject: प्रमुख व्यक्तित्व, राजस्थान का इतिहास एवं संस्कृति, राजस्थान का मध्यकालीन इतिहास एवं राजवंश | Target Exams: RAS, SI, 1st Grade, 2nd Grade, CET, Patwari
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महाराणा उदयसिंह द्वितीय (1537–1572 ई.)

मुख्य परिचय / पृष्ठभूमि

महाराणा उदयसिंह मेवाड़ के गुहिल (सिसोदिया) राजवंश के 53वें शासक, महाराणा संग्राम सिंह प्रथम (राणा सांगा) के सबसे छोटे पुत्र तथा प्रातःस्मरणीय महाराणा प्रताप के पिता थे। उन्होंने अरावली की सुरक्षित उपत्यकाओं में उदयपुर नगर की स्थापना कर मेवाड़ की रक्षा रणनीति को मैदानी किलों से हटाकर सुरक्षित पर्वतीय क्षेत्रों में स्थानांतरित करने की दूरदर्शी नीति का सूत्रपात किया।

महत्वपूर्ण तथ्य एवं डेटा

  • जन्म: 4 अगस्त 1522 ई. (चित्तौड़गढ़ दुर्ग में)।
  • माता-पिता: माता हाड़ी रानी कर्मावती (बूंदी के राव नरबद की पुत्री) एवं पिता महाराणा संग्राम सिंह (राणा सांगा)।
  • रक्षक / धाय माँ: पन्नाधाय (खींची चौहान), जिन्होंने अपने पुत्र चंदन का बलिदान देकर उदयसिंह के प्राणों की रक्षा की।
  • शरण स्थली: कुंभलगढ़ दुर्ग (तत्कालीन किलेदार: आशा देवपुरा)।
  • प्रथम औपचारिक राज्याभिषेक: 1537 ई. (कुंभलगढ़ दुर्ग में मेवाड़ के सामंतों द्वारा)।
  • उदयपुर की स्थापना: 1559 ई. (धूनी माता/मोती मगरी क्षेत्र के निकट)।
  • उदयसागर झील का निर्माण: 1559 से 1565 ई. के मध्य।
  • अकबर का चित्तौड़ आक्रमण: अक्टूबर 1567 ई. से फरवरी 1568 ई.।
  • देहांत: 28 फरवरी 1572 ई. (होली के दिन, गोगुंदा में, 49 वर्ष की आयु में)।
  • समाधि / छतरी: गोगुंदा (उदयपुर) में स्थित।

मुख्य विवरण

1. प्रारंभिक जीवन, पन्नाधाय का बलिदान एवं राज्यारोहण

विक्रमादित्य के अलोकप्रिय और अराजक शासनकाल का लाभ उठाकर दासी-पुत्र बनवीर ने 1536 ई. में विक्रमादित्य की हत्या कर दी और नन्हें उदयसिंह को भी मारने का प्रयास किया। स्वामीभक्त धाय पन्नाधाय ने अपूर्व निष्ठा का परिचय देते हुए उदयसिंह के स्थान पर अपने इकलौते पुत्र चंदन को सुला दिया, जिसे बनवीर ने मार डाला। पन्नाधाय गुप्त रूप से उदयसिंह को लेकर पहले देवलिया और फिर कुंभलगढ़ दुर्ग पहुँची, जहाँ के किलेदार आशा देवपुरा ने उन्हें अपने भतीजे के रूप में शरण दी।
1537 ई. में मेवाड़ के सामंतों को जब वास्तविकता का ज्ञान हुआ, तो उन्होंने कुंभलगढ़ में उदयसिंह का औपचारिक राज्याभिषेक किया। इसके पश्चात 1540 ई. में मारवाड़ के राव मालदेव की सैन्य सहायता से उदयसिंह ने मावली के युद्ध (1540 ई.) में बनवीर को अंतिम रूप से पराजित कर चित्तौड़गढ़ पर अधिकार किया और विधिवत गद्दी संभाली।

2. अफगान नीति एवं शेरशाह सूरी से संबंध

1544 ई. में जब मुगलों को खदेड़कर दिल्ली की सत्ता पर काबिज हुआ अफगान शासक शेरशाह सूरी मेवाड़ की सीमा तक बढ़ा, तो तत्कालीन विषम आंतरिक परिस्थितियों को देखते हुए महाराणा उदयसिंह ने व्यावहारिक कूटनीति अपनाई। उन्होंने युद्ध से बचते हुए चित्तौड़गढ़ दुर्ग की चाबियाँ शेरशाह सूरी के पास भेज दीं। शेरशाह ने अपनी ओर से ख्वास खां को अपना प्रतिनिधि नियुक्त किया। इस प्रकार महाराणा ने बिना किसी रक्तपात के मेवाड़ के गौरव और जन-धन की सुरक्षा सुनिश्चित की।

3. उदयपुर नगर की स्थापना एवं सामरिक नीति में बदलाव

चित्तौड़गढ़ दुर्ग की मैदानी घेरेबंदी के सामरिक दोषों को पहचानते हुए महाराणा उदयसिंह ने अरावली की पहाड़ियों से घिरी सुरक्षित उपत्यका में 1559 ई. में उदयपुर नामक एक नए शहर की नींव रखी।
  • उदयसागर झील: जल संरक्षण और पेयजलापूर्ति हेतु उन्होंने 1559 से 1565 ई. के दौरान उदयसागर झील का निर्माण कराया।
  • मोती महल एवं राजप्रासाद: उदयपुर में उन्होंने ‘मोती मगरी’ पर सुंदर महलों का निर्माण करवाया, जिसे प्रारंभिक प्रशासनिक केंद्र बनाया गया।
  • सुरक्षात्मक रणनीति: इस रणनीतिक बदलाव ने आगे चलकर मुगलों के विरुद्ध मेवाड़ के दीर्घकालिक छापामार युद्ध के लिए एक अभेद्य प्राकृतिक सुरक्षा कवच का काम किया।

4. अकबर का चित्तौड़गढ़ अभियान एवं चित्तौड़ का तीसरा साका (1567–1568 ई.)

अकबर ने अपनी साम्राज्यवादी विस्तार नीति और गुजरात व्यापारिक मार्ग को सुरक्षित करने के उद्देश्य से 23 अक्टूबर 1567 को चित्तौड़गढ़ दुर्ग को घेर लिया।
घटना / पक्ष विवरण एवं ऐतिहासिक तथ्य
सामंतों की सलाह सामंतों (जयमल, फत्ता आदि) की सलाह पर महाराणा उदयसिंह चित्तौड़ दुर्ग की रक्षा का भार सेनापतियों को सौंपकर स्वयं परिवार सहित गिरवा की पहाड़ियों में चले गए।
दुर्ग रक्षक सेनापति जयमल राठौड़ (मेड़ता) और फत्ता (फतेहसिंह) सीसोदिया (केलवा)।
अन्य प्रमुख योद्धा कल्ला जी राठौड़ (चार हाथों वाले लोकदेवता), रावत सांईदास (सलूंबर), ईसरदास चौहान।
जौहर का नेतृत्व फत्ता सीसोदिया की पत्नी रानी फूलकंवर के नेतृत्व में वीरांगनाओं ने जौहर किया।
चित्तौड़ का तीसरा साका 25 फरवरी 1568 ई. को केसरिया और जौहर के साथ चित्तौड़ का तीसरा साका संपन्न हुआ।
अकबर का नरसंहार अकबर ने चित्तौड़ पर अधिकार के बाद लगभग 30,000 निर्दोष नागरिकों के कत्लेआम का आदेश (फतहनामा जारी कर) दिया, जो उसके जीवन पर अमिट कलंक है।
वीरों का सम्मान जयमल और फत्ता की अद्भुत वीरता से प्रभावित होकर अकबर ने आगरा दुर्ग के मुख्य द्वार पर हाथी पर सवार दोनों वीरों की पाषाण मूर्तियां (गजारूढ़ प्रतिमाएं) स्थापित करवाईं।

परीक्षा उपयोगी विशेष बिंदु (High-Yield Facts)

  • कल्ला जी राठौड़ (चार हाथों वाले देवता): चित्तौड़ के तीसरे साके में घायल जयमल को अपने कंधों पर बैठाकर युद्ध करने के कारण कल्ला जी राठौड़ इतिहास में ‘चार हाथों वाले लोकदेवता’ के रूप में प्रसिद्ध हुए। इनकी छतरी चित्तौड़गढ़ दुर्ग के भैरव पोल व हनुमान पोल के मध्य स्थित है।
  • अकबर की ‘संग्राम’ बंदूक: अकबर ने चित्तौड़ घेरे के दौरान रात में दुर्ग की प्राचीर की मरम्मत करवा रहे सेनापति जयमल राठौड़ को अपनी ‘संग्राम’ नामक प्रसिद्ध बंदूक से गोली मारकर घायल कर दिया था।
  • ‘सबात’ और ‘दमदमा’ का प्रयोग: अकबर ने चित्तौड़गढ़ दुर्ग की दीवारों को तोड़ने के लिए बारूदी सुरंगों, ढके हुए रास्तों (सबात) और ऊंचे मिट्टी के टीलों (दमदमा) का व्यापक प्रयोग किया था।
  • हाजी खां पठान का प्रसंग: अजमेर के सूबेदार हाजी खां पठान और मारवाड़ के मालदेव के साथ 1557 ई. में हरमाड़ा के युद्ध (हरमाड़ा, अजमेर) में उदयसिंह पराजित हुए थे।
  • उत्तराधिकार विवाद: महाराणा उदयसिंह ने अपनी प्रिय भटियाणी रानी (धीरबाई) के प्रभाव में आकर अपने योग्य एवं बड़े पुत्र प्रताप के स्थान पर छोटे पुत्र जगमाल को उत्तराधिकारी घोषित किया था, जिसे बाद में सामंतों ने ‘राज्याभिषेक क्रांति’ के माध्यम से हटाकर प्रताप को गद्दी सौंपी।

प्रामाणिक संदर्भ स्रोत

  1. RBSE कक्षा 10: राजस्थान का इतिहास एवं संस्कृति (अध्याय 1: राजस्थान का इतिहास – प्रमुख राजवंश एवं शासक)।
  2. RBSE कक्षा 9: राजस्थान का स्वतंत्रता आंदोलन एवं शौर्य परंपरा (अध्याय: मेवाड़ के शौर्य पुरुष)।
  3. राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी: राजस्थान का इतिहास — प्रो. गोपीनाथ शर्मा (अध्याय: महाराणा उदयसिंह कालीन मेवाड़)।
  4. राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी: राजस्थान का स्वाधीनता संग्राम एवं ऐतिहासिक परंपरा — डॉ. हुकुमचंद जैन व डॉ. नारायण लाल गुप्ता।

Verified Sources & Citations (प्रमाणित संदर्भ एवं स्रोत)

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