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महाराणा प्रताप (1540–1597 ई.)
मुख्य परिचय / पृष्ठभूमि
महाराणा प्रताप मेवाड़ के गुहिल (सिसोदिया) राजवंश के 54वें शासक थे, जिन्होंने मध्यकालीन भारत में मुग़ल सत्ता के विरुद्ध स्वतंत्रता, स्वाभिमान और मातृभूमि की रक्षा हेतु आजीवन अप्रतिम संघर्ष किया। वे अदम्य साहस, उच्च नैतिक मूल्यों तथा अरावली की विषम भौगोलिक परिस्थितियों में छापामार (गोरिल्ला) युद्ध पद्धति के सफल क्रियान्वयन के प्रतीक हैं।
महत्वपूर्ण तथ्य एवं डेटा
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जन्म: 9 मई 1540 ई. (विक्रम संवत 1604, ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया)।
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जन्म स्थान: बादल महल, कटारगढ़ (कुंभलगढ़ दुर्ग)।
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माता-पिता: पिता महाराणा उदयसिंह एवं माता जयवंता बाई (पाली के अखैराज सोनगरा चौहान की पुत्री)।
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बचपन का नाम: कीका (स्थानीय भील समुदाय में बच्चों के लिए प्रयुक्त संबोधन)।
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प्रथम राज्याभिषेक: 28 फरवरी 1572 ई. (फाल्गुन पूर्णिमा / होली के दिन), गोगुंदा में।
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विधिवत राज्याभिषेक: कुंभलगढ़ दुर्ग (जिसमें मारवाड़ के राव चंद्रसेन भी उपस्थित थे)।
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प्रमुख अश्व व गज: अश्व – चेतक; प्रिय हाथी – रामप्रसाद व लूणा।
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देहांत: 19 जनवरी 1597 ई. (चावंड में, 57 वर्ष की आयु में धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाते समय लगी चोट के कारण)।
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समाधि स्थल: बांडोली (चावंड के निकट), जहाँ 8 खंभों की छतरी बनी हुई है।
मुख्य विवरण
1. राज्याभिषेक एवं सत्ता संघर्ष (राज्याभिषेक क्रांति)
महाराणा उदयसिंह ने अपनी भटियाणी रानी (धीरबाई) के प्रभाव में आकर अपने छोटे पुत्र जगमाल को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। 28 फरवरी 1572 को गोगुंदा में उदयसिंह के देहांत के समय जब जगमाल गद्दी पर बैठा, तब मेवाड़ के वरिष्ठ सामंतों—विशेषकर कृष्णदास चूंडावत (सलूंबर), रामशाह तंवर (ग्वालियर) और अखैराज सोनगरा (पाली)—ने जनभावना व योग्यता के आधार पर जगमाल को हटाकर महाराणा प्रताप का विधिवत राज्याभिषेक गोगुंदा में किया। इस घटना को मेवाड़ के इतिहास में ‘राज्याभिषेक क्रांति’ कहा जाता है। इसके पश्चात कुंभलगढ़ दुर्ग में एक भव्य उत्सव के साथ उनका द्वितीय व औपचारिक राज्याभिषेक संपन्न हुआ।
2. अकबर द्वारा भेजे गए राजनयिक शिष्टमंडल
अकबर ने महाराणा प्रताप को मुग़ल अधीनता स्वीकार कराने और संधि के लिए चार प्रमुख शिष्टमंडल भेजे, जो पूरी तरह असफल रहे:
| क्रम | शांति दूत | आगमन समय | परिणाम |
| 1 | जलाल खां कोरची | नवंबर 1572 ई. | असफल |
| 2 | कुंवर मानसिंह (आमेर) | जून 1573 ई. | असफल |
| 3 | राजा भगवानदास (भगवंतदास) | अक्टूबर 1573 ई. | असफल |
| 4 | राजा टोडरमल | दिसंबर 1573 ई. | असफल |
(याद रखने हेतु सूत्र: J-M-B-T)
3. हल्दीघाटी का ऐतिहासिक युद्ध (18 जून 1576 ई.)
(डॉ. गोपीनाथ शर्मा के अनुसार तिथि: 21 जून 1576 ई.)
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सेनापति एवं नेतृत्व: मुग़ल सेना का मुख्य सेनापति कुंवर मानसिंह (प्रथम बार स्वतंत्र कमान) तथा सहायक सेनापति आसफ खां था। मुग़ल सेना के साथ बदायूंनी व्यक्तिगत रूप से उपस्थित था।
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मेवाड़ की व्यूहरचना:
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हरावल (अग्रिम दस्ता): इसका नेतृत्व अफ़गान योद्धा हकीम खां सूर ने किया (प्रताप की सेना के एकमात्र मुस्लिम सेनापति)। इनके साथ ग्वालियर के रामशाह तंवर और उनके पुत्र भी थे।
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चंद्रावल (पश्चिमी/पिछला दस्ता): इसका नेतृत्व राणा पूंजा (पूंजा भील) ने किया।
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मध्य भाग (ढोलान): महाराणा प्रताप स्वयं अपनी मुख्य सेना के साथ केंद्र में स्थित थे।
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युद्ध का घटनाक्रम: युद्ध के दौरान चेतक के घायल होने और प्रताप के जीवन पर संकट आने पर सादड़ी के झाला बीदा (झाला मान) ने महाराणा प्रताप का राजमुकुट व छत्र धारण किया और स्वयं को बलिदान कर प्रताप को सुरक्षित युद्धभूमि से बाहर निकाला। बलिचा ग्राम में चेतक वीरगति को प्राप्त हुआ, जहाँ उसका स्मारक स्थित है।
4. दिवेर का युद्ध (अक्टूबर 1582 ई.) — मेवाड़ का पुनरुत्थान
अक्टूबर 1582 में विजयादशमी के दिन प्रताप ने दिवेर स्थित मुग़ल थाने पर भारी आक्रमण किया। इस थाने का मुग़ल प्रभारी अकबर का चाचा सुल्तान खां था। महाराणा प्रताप के ज्येष्ठ पुत्र कुंवर अमरसिंह प्रथम ने सुल्तान खां पर भाले का ऐसा भीषण प्रहार किया कि वह घोड़े सहित कट गया। दिवेर की विजय के बाद प्रताप ने कुंभलगढ़, गोगुंदा और आसपास के अधिकांश मुग़ल थानों पर पुनः नियंत्रण स्थापित कर लिया।
5. चावंड राजधानी और सांस्कृतिक विकास (1585–1597 ई.)
1585 ई. में महाराणा प्रताप ने छप्पन क्षेत्र के लूणा चावंडिया को पराजित कर चावंड को अपनी संकटकालीन राजधानी बनाया। यह राजधानी 1585 से लेकर 1597 (प्रताप की मृत्यु) तक और उसके बाद 1615 ई. (मुगल-मेवाड़ संधि) तक कुल 30 वर्षों तक मेवाड़ की राजधानी रही।
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स्थापत्य व धर्म: चावंड में प्रताप ने अपने आवास, महल और कुलदेवी चामुंडा माता के मंदिर का निर्माण करवाया।
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चित्रकला: चावंड से मेवाड़ चित्रशैली के एक नए रूप ‘चावंड शैली’ का स्वतंत्र विकास शुरू हुआ। इस शैली का प्रमुख प्रारंभिक चित्रकार निसारदीन (नासिरुद्दीन) था।
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साहित्य एवं विद्वान: प्रताप के दरबार में प्रसिद्ध प्रकांड पंडित चक्रपाणि मिश्र आश्रित थे, जिन्होंने निम्नलिखित प्रामाणिक ग्रंथों की रचना की:
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विश्ववल्लभ (कृषि, वृक्षायुर्वेद एवं उद्यान विज्ञान)
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मुहूर्तमाला (ज्योतिष शास्त्र)
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व्यवहारदर्श (न्याय व विधि)
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राज्याभिषेक पद्धति (राज्याभिषेक की शास्त्रीय विधि)
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हेमरत्न सूरि: इन्होंने प्रसिद्ध काव्य ग्रंथ ‘गोरा बादल री बात’ की रचना की।
परीक्षा उपयोगी विशेष बिंदु (High-Yield Facts)
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हल्दीघाटी युद्ध के उपनाम व संज्ञाएँ:
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‘खमनौर का युद्ध’ — अबुल फज़ल (अकबरनामा में)।
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‘गोगुंदा का युद्ध’ — अब्दुल कादिर बदायूंनी (मुंतखब-उत-तवारीख में)।
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‘मेवाड़ की थर्मोपल्ली’ — कर्नल जेम्स टॉड।
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‘हाथियों का युद्ध’ — हाथियों (लूणा, रामप्रसाद विरुद्ध गजमुक्ता, गजराज) के भीषण द्वंद्व के कारण।
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‘मेवाड़ का मैराथन’ — कर्नल जेम्स टॉड ने दिवेर के युद्ध (1582 ई.) को यह संज्ञा दी।
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हाथी रामप्रसाद का प्रसंग: महाराणा के हाथी ‘रामप्रसाद’ की वीरता से प्रभावित होकर मुगलों ने उसे बंदी बना लिया और अकबर ने उसका नाम बदलकर ‘पीरप्रसाद’ रखा।
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मेवाड़ का उद्धारक / दानवीर: 1578 ई. में ईडर के पास चूलिया ग्राम में पालीवाल ब्राह्मण भामाशाह और उनके भाई ताराचंद ने अपनी निजी संपत्ति (25 लाख रुपये व 20,000 अशर्फियां) प्रताप को समर्पित की, जिससे 25,000 सैनिकों का 12 वर्ष तक का निर्वाह संभव हुआ।
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अकबर का अंतिम प्रत्यक्ष अभियान: अकबर ने महाराणा प्रताप के विरुद्ध अपना अंतिम सैन्य अभियान 6 दिसंबर 1584 ई. को जगन्नाथ कछवाहा के नेतृत्व में भेजा था, जो निष्फल रहा (जगन्नाथ कछवाहा की 32 खंभों की छतरी मांडल, भीलवाड़ा में स्थित है)।
प्रामाणिक संदर्भ स्रोत
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RBSE कक्षा 10: राजस्थान का इतिहास एवं संस्कृति (अध्याय 1: राजस्थान का इतिहास – एक परिचय)।
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RBSE कक्षा 9: राजस्थान का स्वतंत्रता आंदोलन एवं शौर्य परंपरा (अध्याय: राजस्थान के प्रमुख शौर्य पुरुष)।
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राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी: राजस्थान का इतिहास — प्रो. गोपीनाथ शर्मा।
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राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी: राजस्थान का स्वतंत्रता संग्राम एवं जनआंदोलन — डॉ. हुकुमचंद जैन एवं डॉ. नारायण लाल गुप्ता।