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भटियाणी रानी (धीरबाई)
मुख्य परिचय / पृष्ठभूमि
रानी धीरबाई (भटियाणी रानी) मेवाड़ के महाराणा उदयसिंह द्वितीय की अत्यंत प्रिय एवं प्रभावशाली पटरानी थीं। वे जैसलमेर के भाटी राजवंश से संबंधित थीं और मेवाड़ के इतिहास में प्रसिद्ध उत्तराधिकार संघर्ष तथा ‘राज्याभिषेक क्रांति (1572 ई.)’ की केंद्रीय ऐतिहासिक पात्र रहीं।
महत्वपूर्ण तथ्य एवं डेटा
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नाम: धीरबाई (इतिहास में ‘भटियाणी रानी’ के नाम से प्रसिद्ध)।
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राजवंश/मायका: जैसलमेर का भाटी राजवंश।
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पति: महाराणा उदयसिंह द्वितीय (मेवाड़ के 53वें शासक)।
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पुत्र: जगमाल और सागरसिंह (मुख्यतः जगमाल के संदर्भ में प्रसिद्ध)।
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सौतेले पुत्र: महाराणा प्रताप (ज्येष्ठ पुत्र, माता: जयवंता बाई सोनगरा) एवं शक्तिसिंह।
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ऐतिहासिक घटना: 28 फरवरी 1572 ई. को गोगुंदा में महाराणा उदयसिंह की मृत्यु के बाद अपने पुत्र जगमाल को मेवाड़ की गद्दी पर बैठाने का प्रयास।
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परिणाम: मेवाड़ के सामंतों द्वारा ‘राज्याभिषेक क्रांति’ के माध्यम से जगमाल को गद्दी से हटाकर महाराणा प्रताप का विधिवत राज्याभिषेक किया गया।
मुख्य विवरण
1. पारिवारिक पृष्ठभूमि एवं मेवाड़ दरबार में प्रभाव
धीरबाई जैसलमेर के भाटी कुल की राजकुमारी थीं। महाराणा उदयसिंह के अंतःपुर में अनेक रानियाँ थीं, जिनमें पाली के अखैराज सोनगरा चौहान की पुत्री जयवंता बाई (प्रताप की माता) सबसे बड़ी रानी थीं। इसके बावजूद, महाराणा उदयसिंह रानी धीरबाई के रूप, चातुर्य और व्यक्तित्व से अत्यधिक प्रभावित थे। धीरबाई के इसी विशेष प्रभाव के कारण महाराणा उदयसिंह ने ज्येष्ठता और योग्यता के परंपरागत नियमों की अनदेखी करते हुए धीरबाई के पुत्र जगमाल को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था।
2. उत्तराधिकार विवाद एवं ‘राज्याभिषेक क्रांति’ (28 फरवरी 1572 ई.)
28 फरवरी 1572 को होली (फाल्गुन पूर्णिमा) के दिन गोगुंदा में महाराणा उदयसिंह का देहांत हुआ। मेवाड़ की प्राचीन परंपरा के अनुसार जब तक नया शासक गद्दी पर न बैठे, तब तक दिवंगत महाराणा की अंत्येष्टि नहीं की जा सकती थी और जो उत्तराधिकारी होता था, वह श्मशान घाट नहीं जाता था।
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रानी धीरबाई के निर्देशानुसार जगमाल राजमहलों में रुक गया और राजतिलक की तैयारी करने लगा।
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ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते महाराणा प्रताप अपने पिता के अंतिम संस्कार हेतु श्मशान घाट (गोगुंदा) पहुँचे।
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अंत्येष्टि स्थल पर जब मेवाड़ के प्रमुख सामंतों—विशेषकर रावत कृष्णदास चूंडावत (सलूंबर), रामशाह तंवर (ग्वालियर) और अखैराज सोनगरा (पाली)—ने जगमाल के राज्यारोहण का विरोध किया, तो उन्होंने निर्णय लिया कि संकटकाल में अयोग्य जगमाल के स्थान पर योग्य व पराक्रमी प्रताप ही मेवाड़ के सच्चे शासक होने चाहिए।
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सामंतों ने श्मशान से लौटकर जगमाल को राजसिंहासन से उतारा और महाराणा प्रताप को गोगुंदा में मेवाड़ के 54वें महाराणा के रूप में प्रतिष्ठित किया।
3. रानियों एवं उनके पुत्रों की ऐतिहासिक तुलना
| विवरण | महारानी जयवंता बाई | रानी धीरबाई (भटियाणी रानी) |
| राजवंश (मायका) | सोनगरा चौहान (पाली के अखैराज की पुत्री) | भाटी राजवंश (जैसलमेर) |
| पद एवं स्थिति | महाराणा उदयसिंह की प्रथम/बड़ी पटरानी | महाराणा उदयसिंह की सबसे प्रिय रानी |
| पुत्र | महाराणा प्रताप (ज्येष्ठ पुत्र) | जगमाल (छोटा पुत्र) |
| सामंतों का समर्थन | पूर्ण समर्थन (सर्वमान्य व योग्य) | सामंतों द्वारा अमान्य एवं अस्वीकृत |
| ऐतिहासिक योगदान | प्रताप में राष्ट्रभक्ति व स्वाभिमान के संस्कार भरे | पुत्र-मोह के कारण उत्तराधिकार संकट उत्पन्न हुआ |
4. धीरबाई के पुत्र जगमाल का परवर्ती इतिहास
राजगद्दी से अपदस्थ किए जाने के बाद जगमाल असंतुष्ट होकर अकबर की शरण में चला गया:
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मुगल मनसब व जहागीर: अकबर ने जगमाल का स्वागत किया और उसे पहले जहाजपुर (भीलवाड़ा) का परगना जागीर में दिया।
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सिरोही विवाद व दत्ताणी का युद्ध (1583 ई.): बाद में अकबर ने जगमाल को सिरोही का आधा राज्य देकर वहाँ का शासक नियुक्त किया। सिरोही के मूल शासक राव सुरतान देवड़ा के साथ 1583 ई. में प्रसिद्ध ‘दत्ताणी का युद्ध’ हुआ, जिसमें जगमाल मारा गया।
परीक्षा उपयोगी विशेष बिंदु (High-Yield Facts)
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राज्याभिषेक क्रांति का मूल कारण: रानी धीरबाई का हठ और महाराणा उदयसिंह द्वारा ज्येष्ठ पुत्र प्रताप की उपेक्षा कर छोटे पुत्र जगमाल को उत्तराधिकारी नामित करना।
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चूंडावतों का विशेषाधिकार: धीरबाई के प्रयास को निष्फल करने में सलूंबर के रावत कृष्णदास चूंडावत की निर्णायक भूमिका थी, क्योंकि मेवाड़ के महाराणा को तलवार बाँधने और गद्दी पर बैठाने का वंशानुगत अधिकार चूंडावत सरदारों के पास था।
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जगमाल का अंत: रानी धीरबाई का पुत्र जगमाल 1583 ई. में ‘दत्ताणी के युद्ध’ (सिरोही) में राव सुरतान के विरुद्ध लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ।
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मेवाड़ की रानियों का राजनीति में प्रभाव: मध्यकालीन मेवाड़ के इतिहास में रानी कर्मावती और रानी धीरबाई दो ऐसी रानियाँ रहीं, जिनके राजनीतिक निर्णयों और अंतःपुर के प्रभाव ने मेवाड़ की सत्ता संरचना को सीधे तौर पर प्रभावित किया।
प्रामाणिक संदर्भ स्रोत
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RBSE कक्षा 10: राजस्थान का इतिहास एवं संस्कृति — अध्याय 1 (मेवाड़ का इतिहास: महाराणा उदयसिंह व महाराणा प्रताप कालीन घटनाक्रम)।
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राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी: राजस्थान का इतिहास — प्रो. गोपीनाथ शर्मा (गोगुंदा में उत्तराधिकार निर्णय एवं राज्याभिषेक क्रांति)।
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राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी: राजस्थान का स्वाधीनता संग्राम एवं शौर्य परंपरा — डॉ. हुकुमचंद जैन एवं डॉ. नारायण लाल गुप्ता।